Here is a compilation of essays on ‘Environmental Pollution’ for class 6, 7, 8, 9 and 10. Find paragraphs, long and short essays on ‘Environmental Pollution’ especially written for school and college students in Hindi language.

Essay # 1. वायु प्रदूषण (Air Pollution):

जब वायुमण्डल में बाह्य स्रोतों से धूल, गैस, दुर्गन्ध, धुआँ और वाष्प इतनी मात्रा में उपस्थित हो जाए कि उससे वायु के मूल गुणों में अंतर आ जाए तथा उससे मानव जीवन और संपत्ति को नुकसान होने लगे तो उसे वायु प्रदूषण कहते हैं ।

वायु प्रदूषण के स्रोत:

(1) वाहनों के द्वारा:

वाहनों से निकलने वाले धुएँ में अनेक प्रकार की जहरीली गैसें होती हैं जो वायुमण्डल में पहुँचकर वायु को दूषित करती हैं । सीसा, कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड आदि गैसें वायु प्रदूषण फैलाती हैं ।

(2) उद्योगों द्वारा:

अनेक उद्योग जैसे रासायनिक, इस्पात, खाद, सीमेंट, चीनी आदि बनाने वाले उद्योग भी वायु प्रदूषण को बढ़ाते हैं । इनसे निकलने वाली विभिन्न गैसें तथा धूल के कण वायु में प्रवेश कर वायुमण्डल को प्रदूषित कर देते हैं ।

(3) कृषि क्रियाएँ:

फसलों को हानिकारक जीवों से बचाने के लिए कई प्रकार के कीटनाशक दवाओं का छिड़काव किया जाता है । छिड़काव से कुछ रसायन वायु में मिलकर वायु प्रदूषित करते हैं ।

(4) घरेलू प्रदूषण:

आज भी कई स्थानों पर भोजन पकाने हेतु लकड़ी, कंडे (उपले) तथा कृषि-कचरे का उपयोग होता है । इनके जलने से उत्पन्न धुआँ वायु को प्रदूषित करता है । इसी प्रकार घर का कूड़ा-कचरा बाहर फेंकने से भी वायु में प्रदूषण बढ़ता हैं ।

(5) व्यक्तिगत आदतें:

सार्वजनिक स्थलों पर धूमपान करने से वायु में धुआँ बढ़ता है ।

(6) प्राकृतिक स्रोतों द्वारा:

प्राकृतिक विपदाएँ जैसे ज्वालामुखी, विस्फोट आदि भी वायु प्रदूषण का स्रोत हैं ।

(7) दुर्घटनाएँ:

कभी-कभी मानव की असावधानी से अनेक दुर्घटनाएँ जैसे आणविक स्टेशन पर विस्फोट, युद्ध सामग्री में आग, कारखानों से गैस रिसाव आदि वायु में प्रदूषण का कारण बन जाती हैं ।

वायु प्रदूषण का प्रभाव:

i. कारखानों से विभिन्न प्रकार की हानिकारक गैसें निकलती हैं जो सांस द्वारा हमारे शरीर में पहुँचकर कई प्रकार के रोग पैदा कर देती हैं । प्रदूषित वायु से श्वसन तंत्र, आँखों तथा त्वचा की कई बीमारियाँ पैदा हो जाती हैं ।

ii. कारखानों से निकलने वाले हानिकारक रसायन वर्षा के जल में मिलकर अजीय वर्षा करते हैं जिसका प्रभाव मनुष्य, पशु-पक्षी, पौधे तथा इमारतों सभी पर पडता है ।

वायु प्रदूषण नियंत्रण:

i. वायु प्रदूषण का प्रमुख कारण उद्योग धंधों से निकलने वाली हानिकारक गैसें हैं अत: उद्योग-धंधों को शहर से दूर स्थापित करना चाहिए तथा उद्योगों की चिमनियों को निर्धारित ऊँचाई तक रखना चाहिए ।

ii. प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों पर रोक लगाई जानी चाहिए ।

iii. कूड़ा-करकट, सड़ी-गली वस्तुओं आदि को इधर-उधर खुले में न डालकर बस्ती के बाहर किसी गड्डे में डाला जाना चाहिए ।

iv. औद्योगिक दुर्घटनाओं से निपटने के लिए उद्योगों के सुरक्षा प्रबंधों की नियमित जाँच की जानी चाहिए ।

v. घरों में परम्परागत ईंधन (लकड़ी, कोयला, गोबर आदि) के स्थान पर सौर ऊर्जा, बायोगैस आदि वैकल्पिक स्रोतों को बढ़ावा देना चाहिए ।

vi. अधिक वृक्ष लगाकर:

पौधे अपना भोजन बनाने में कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग करते हैं तथा ऑक्सीजन छोड़ते हैं इसीलिए वृक्षारोपण करना चाहिए ।

Essay # 2. जल प्रदूषण (Water Pollution):

वह जल जिसमें अनेक प्रकार के खनिज कार्बनिक-अकार्बनिक पदार्थ, गैसें तथा कई अनावश्यक एवं हानिकारक पदार्थ आधिक मात्रा में घुल जाते हैं, प्रदूषित जल कहलाते है ।

जल प्रदूषण के स्रोत:

(i) उद्योगों द्वारा:

विभिन्न उद्योगों से निकलने वाला बचा हुआ अपशिष्ट पदार्थ नदियों, तालाबों में जाकर जल प्रदूषित करता है ।

(ii) मनुष्य की दैनिक क्रियाएँ:

नदी, तालाबों आदि में कपड़े धोने, नहाने, पशुओं को नहलाने, सीवेज लाइन का गंदा जल प्रवाहित करने के कारण जल प्रदूषण फैलता है । सफाई के लिए प्रयोग किए जा रहे नए-नए डिटरजेंट भी जल में घुलकर जल को प्रकृपित कर देते हैं ।

(iii) कृषि रसायन एवं कीटनाशक दवाएँ:

फसलों के अधिक उत्पादन के लिए उपयोग किए जा रहे विभिन प्रकार की खादें एवं कीटनाशक दवाएँ वर्षा के जल के साथ नदियों तालाबों में पहुँचकर उनका जल प्रदूषित कर देती हैं ।

जल प्रदूषण के प्रभाव:

(i) प्रदूषित जल का प्रभाव मानव के साथ-साथ, पेड़-पौधों और जन्तुओं पर भी पड़ता है । प्रदूषित जल के सेवन से कई रोग पेचिश, हैजा, मोतीझरा आदि उत्पन्न हो जाते हैं ।

जलीय पादप इससे अधिक प्रभावित होते हैं । जल में रसायनों के कारण जलकुम्भी एवं शैवाल की वृद्धि तीव्र हो जाती है और जलीय पौधों एवं जीवों को ऑक्सीजन की मात्रा कम प्राप्त होती है जिससे उनकी वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है । जल प्रदूषण के कारण जलीय जंतुओं की भी संख्या घट जाती है ।

(ii) जल प्रदूषण से उपजाऊ मृदा को भी हानि होती है । भूमि की उर्वरता कम हो जाती है ।

जल प्रदूषण नियंत्रण:

(i) नदी, तालाब आदि में नहाने, कपड़े धोने, पशुओं को नहलाने पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए । पशुओं और मनुष्यों को लिए पृथक-पृथक तालाब बनाए जाना चाहिए ।

(ii) पेयजल स्रोतों की सफाई, जाँच व सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए ।

(iii) उद्योगों से निकलने वाले प्रदूषित जल को शुद्धीकरण के बाद ही बाहर निकाला जाना चाहिए ।

(iv) प्रत्येक नगर में वाहित जल शोधन संयंत्र लगाए जाएँ जिससे जल से प्रदूषणकारी तत्व पृथक किए जा सकें ।

(v) जल प्रदूषण को कम करने के पुन चक्रण तरीकों का विकास करना आवश्यक है । इसके लिए गोबर गैस संयंत्र तथा बायोगैस संयंत्र को लगाया जाना चाहिए ।

Essay # 3. मृदा प्रदूषण (Soil Pollution):

यह समस्त जीव-जन्तुओं और पेड़-पौधों को भोजन एवं आश्रय प्रदान करती है । मृदा में विविध लवण, खनिज, कार्बनिक पदार्थ, गैसें व जल एक निश्चित अनुपात में होते हैं परन्तु जब प्राकृतिक एवं मानव जनित कारणों से मृदा की गुणवत्ता का हास होने लगता है तो वह मृदा प्रदूषित हो जाती है । इस प्रकार मृदा के मौलिक रासायनिक एवं जैविक गुणों पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव को मृदा प्रदूषण कहते हैं ।

मृदा प्रदूषण के स्रोत:

(i) विभिन्न प्राकृतिक कारणों:

जैसे मृदा अपरदन, ज्वालामुखी, भूस्खलन, समुद्री तूफान आदि मृदा प्रदूषण के प्राकृतिक स्रोत हैं ।

(ii) कृषि द्वारा:

बढ़ती जनसंख्या के कारण फसलों की पैदावार बढ़ाने हेतु उपयोग किए जा रहे रसायनों से मृदा प्रदूषित हो जाती है ।

(iii) घरेलू और औद्योगिक अपशिष्ट द्वारा:

घरेलू तथा औद्योगिक संस्थानों से निकाले अपशिष्ट पदार्थ जैसे: सीसा, ताँबा, पारा, एल्युमीनियम, प्लास्टिक, कागज, कपड़ा आदि मृदा में मिलकर इसे प्रदूषित करते हैं ।

(iv) वनों का विनाश:

जिन क्षेत्रों में वनों का विनाश बड़े स्तर पर हुआ है वहाँ की मृदा के जैविक गुण समाप्त होते जा रहे हैं । वनों के बिना भूमिगत जल में कमी, वाष्पीकरण में वृद्धि, ताप में वृद्धि, सूक्ष्मजीवों की कमी आती है ।

(v) भूक्षरण द्वारा भी मृदा प्रदूषण होता है ।

मृदा प्रदूषण के प्रभाव:

(i) मानव व अन्य जीवधारियों की भोजन, आवास आदि संबंधी आवश्यकताओं पर मृदा का प्रभाव पड़ता है ।

(ii) मृदा पर पड़े अपशिष्ट पदार्थों से विभिन्न रोग उत्पन्न हो सकते हैं क्योंकि उस पर कई सूक्ष्मजीव विकसित हो जाते हैं ।

(iii) मृदा प्रदूषण से मृदा की उर्वरता घट जाती है अत: वनस्पतियों पर दुष्प्रभाव पड़ता है ।

(iv) कीटनाशक छिड़काव से मृदा में रहने वाले जीव नष्ट हो जाते हैं ।

(v) प्रदूषित मृदा पर लगने वाली वनस्पतियों के सेवन से विभिन रोग उत्पन्न हो सकते हैं ।

मृदा प्रदूषण नियंत्रण:

(i) फसलों पर छिड़कने वाली विषैली दवाओं का प्रयोग प्रतिबंधित किया जाना चाहिए ।

(ii) कृत्रिम उर्वरकों के स्थान पर जैविक खाद का उपयोग कृषि भूमि में होना चाहिए ।

(iii) भू-क्षरण को रोकने के उपाय किए जाने चाहिए ।

(iv) गाँव तथा नगरों में मल एवं गंदगी को एकत्रित करने के उचित स्थान होने चाहिए ।

(v) वनों के विनाश पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए तथा वृक्षारोपण अधिक किया जाना चाहिए ।

Essay # 4. ध्वनि प्रदूषण (Noise Pollution):

ध्वनि किसी वस्तु के कम्पन से उत्पन्न होती है जो तीव्रता के अनुसार मंद, मध्यम या तीव्र हो सकती है । तीव्र ध्वनि प्रदूषण का कारण बनती है और उसे हम शोर कहते हैं । “कोई भी आवाज जो उसे ग्रहण करने वाले के लिए अवांछित हो, शोर कहलाती है ।”

ध्वनि प्रदूषण के स्रोत:

i. प्राकृतिक प्रकोप:

जैसे आँधी, तेज वर्षा, बिजली की कड़कड़ाहट, भूकंप, तूफान आदि ध्वनि प्रदूषण के प्राकृतिक स्रोत हैं ।

ii. परिवहन द्वारा:

ट्रक, कारें, बस, स्कूटर, रेलगाड़ी, हवाई जहाज आदि के द्वारा बहुत अधिक ध्वनि प्रदूषण फैलता है ।

iii. उद्योग:

कारखानों में उपयोग की जाने वाली विभिन्न मशीनों, साइरन, जनरेटर आदि अनेक यांत्रिक उपकरण ध्वनि प्रदूषण फैलाते हैं ।

iv. मनोरंजन के साधन:

आज की आधुनिक जीवन शैली में यह ध्वनि प्रदूषण का प्रमुख कारण हैं ध्वनि विस्तारक, रेडियो, टेपरिकार्डर, ट्रांजिस्टर, टी.वी., भोंपू आदि द्वारा ध्वनि प्रदूषण फैलाते हैं ।

v. घरेलू उपकरण:

वाशिंग मशीन, कूलर्स, मिक्सी, एयर कंडीशनर आदि द्वारा भी ध्वनि प्रदूषण होता है ।

vi. पटाखे:

तेज आवाज वाले पटाखों से भी ध्वनि प्रदूषण होता है ।

ध्वनि प्रदूषण का प्रभाव:

ध्वनि प्रदूषण का मानव पर शारीरिक एवं मानसिक दोनों प्रकार से प्रभाव पड़ता है ।

i. ध्वनि प्रदूषण का सबसे हानिकारक प्रभाव हमारे श्रवण यंत्र (श्रवणेन्द्रिय) अथवा कानों पर पड़ता है । बहुत तेज ध्वनि से कान का परदा फट सकता है । कम सुनाई देना, कान का सुन्न होना आदि प्रभाव भी पड़ सकते हैं ।

ii. हृदय एवं पाचन तंत्र पर भी ध्वनि का प्रभाव पड़ता है । अधिक शोर में रहने वाले व्यक्ति में रक्तचाप का बढ़ना हृदय गति का तेज होना दिल के दौरे पड़ने की संभावना बढ़ जाती है ।

iii. अधिक शोर से व्यक्ति की सहनशक्ति में कमी, चिड़चिड़ापन, अनिद्रा, भ्रम, एकाग्रता में कमी, कार्य करने की क्षमता में कमी आ जाती है ।

iv. अत्याधिक शोर के कारण पशु-पक्षी अपने आवास छोड़ देते हैं ।

ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण:

i. वाहनों का उचित रखरखाव, तीव्र ध्वनि वाले हार्न पर प्रतिबंध से ध्वनि प्रदूषण कम किया जा सकता है ।

ii. उद्योगों में पुराने हो चुके यंत्रों को बदला जाना चाहिए तथा कारखानों को शहर से दूर स्थापित किया जाना चाहिए ।

iii. घरेलू उपकरणों की नियमित सफाई तथा स्नेहक पदार्थों का प्रयोग करके ध्वनि कम की जा सकती है ।

iv. सघन आबादी वाले क्षेत्रों में आतिशबाजी के प्रयोग पर रोक लगाई जानी चाहिए ।

v. ध्वनि प्रदूषण के नियंत्रण में वृक्ष भी उपयोगी सिद्ध होते हैं । वृक्ष उच्च ध्वनि तरंगों का अवशोषण करने के साथ ही उन्हें वायुमण्डल में विक्षेपित करने में सहायक होते हैं अत: अधिक से अधिक वृक्षारोपण किया जाना चाहिए ।